जन संस्कृति मंच के आयोजन में देश के नामचीन लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने किया प्रतिरोध की रचनाओं का पाठ
रायपुर। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में दक्षिणपंथी सरकार के तामझाम से भरे साहित्य उत्सव का अर्थहीन शोर-शराबा कायम था; तो दूसरी तरफ़ वे लेखक, कवि, कलाकार और संस्कृतिकर्मी भी एकजुट हुए, जो इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि अभी विचारधारा की मौत नहीं हुई है।
जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई ने वृंदावन हॉल में सृजन संवाद-3 के तहत प्रतिरोध की रचनाओं के पठन-पाठन का आयोजन किया था। इस आयोजन में प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, भारतीय जन-नाट्य संघ इप्टा से जुड़े लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के अलावा बड़ी संख्या में गंभीर पाठकों और नौजवानों की मौजूदगी देखने को मिली।
आयोजन में शिरकत करने वाले रचनाकारों के साथ-साथ प्रबुद्धजनों ने यह माना कि यदि कोई सच्चे अर्थों में लेखक और संस्कृतिकर्मी है तो वह किसी भी सूरत में सत्ता की ग़लत नीतियों का पक्षधर नहीं हो सकता। एक सच्चा सृजनकर्मी अपने आपमें विपक्ष होता है। यदि किसी लेखक और संस्कृतिकर्मी को यह नहीं मालूम कि उसका पक्ष क्या है और वह किसके साथ खड़ा है तो उसे लेखक और रचनाकार मानना बेमानी होगी।
कार्यक्रम के प्रारंभ में वर्षा बोपचे ने गीतकार रामाज्ञा शशिधर के गीत ‘वे सारे हमारी कतारों में शामिल’ को शानदार ढंग से प्रस्तुत किया.
संस्कृतिकर्मी सुनीता शुक्ला ने वामिक़ जौनपुरी के गीत-“यकीं से काम लो, वहमों-गुमाँ से कुछ नहीं होता,/ जमीं पर रहने वालों, आसमां से कुछ नहीं होता…” को धारदार ढंग से पेश किया।
अशोक नगर मध्यप्रदेश की रंगकर्मी सीमा राजोरिया ने जावेद अख्तर की मशहूर नज़्म “एक हमारी और एक उनकी मुल्क में हैं आवाज़ें दो” का बेहतरीन पाठ किया।
देश के नामचीन कथाकार मनोज रुपड़ा ने पहली बार एक नज़्म का पाठ किया। उनकी नज़्म का मुख्य स्वर यहीं था कि चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न उत्पन्न हो जाए: एक लेखक को अपना हस्तक्षेप दर्ज करते रहना चाहिए। श्रोताओं ने उनकी नज़्म और कहन के अंदाज को खूब पसंद किया।
वरिष्ठ पत्रकार और कवि सुदीप ठाकुर रायपुर ने ‘दरबार’ शीर्षक से सामयिक व्यंग्य कविता का पाठ किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता ने प्रतिवाद के साथ ही एकजुटता को खौफ़नाक समय की ज़रुरत बताते हुए धारदार ग़ज़लों का पाठ किया। पेशे से पत्रकार समीर दीवान ने ‘सुपुर्द’ और बीज शीर्षक से महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ किया।
अशोक नगर मध्यप्रदेश से आए कवि और संस्कृतिकर्मी हरिओम राजोरिया ने अपनी नई कविता ‘एक तरह से’ के जरिए व्यवस्था पर प्रहार किया।
कविता, कहानी और आलोचना के सशक्त हस्ताक्षर बसंत त्रिपाठी इलाहाबाद ने छंदमय व्यंग्य कविता ‘देश का नेता कैसा हो?’ का शानदार पाठ किया। जन संस्कृति मंच की रायपुर ईकाई से संबद्ध शायर अब्दुल जावेद नदीम, अलीम नकवी और जनवादी लेखक संघ भिलाई के शायर मुमताज़ ने अपनी रचनाओं के जरिए प्रतिवाद दर्ज किया।
संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी ने हफ़ीज़ मेरठी की महत्वपूर्ण ग़ज़ल ‘आबाद रहेंगे वीराने, शादाब रहेंगी…’ की प्रस्तुति दी।
जसम की वरिष्ठ साथी रूपेंद्र तिवारी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने बिलासपुर में लेखक मनोज रुपड़ा के साथ घटित घटना के बाद लिखी गई एक कविता का भी पाठ किया।
इस आयोजन की खास बात यह थी कि उपस्थित श्रोताओं ने अपने प्रिय रचनाकारों के साथ संवाद किया।
जसम के इस महत्वपूर्ण आयोजन में संस्कृतिकर्मी अनीता त्रिपाठी, संतोष सोनी, सीमा कुजूर, समीक्षा नायर, डॉ. संजू पूनम, सर्वज्ञ नायर, सनियारा खान, कल्याणी, नीलिमा मिश्रा, प्रियंका बघेल, इन्द्र राठौर, कनक कुमार, पीसी रथ, सुरेश वाहने, मिनहाज असद, आनंद बहादुर, राजेन्द्र जैन, समयलाल विवेक, गिरधर जी बरनवा, प्रकाश साहू, निसार अली, आलोक वर्मा, केशव तिवारी, अरुणकांत शुक्ला, शशिकांत गोस्वामी, राजेश कुमार मानस, समयलाल विवेक, मनोज कुमार सोनवानी, विभोर तिवारी, बालकृष्ण अय्यर, डॉ. विपल्व बंद्योपाध्याय, उमा प्रकाश ओझा, भागीरथी वर्मा, मांगीलाल यादव, शेखर नाग, डॉ. अखिलेश त्रिपाठी, बृजेन्द्र तिवारी, घनश्याम त्रिपाठी, अनूप रॉय, विवेक कुमार, डॉ. एनपी. यादव, डेविड दत्त, डॉ. अंकुर शुक्ल, डॉ. नरेश कुमार साहू, अक्षतधर दीवान, विद्यानंद ठाकुर, कमल शुक्ला, एजाज कैसर, विकल्प, नरेश गौतम, तत्पुरुष सोनी, राकेश कुमार तिवारी, प्रेम दुबे, अखिलेश एडगर, शशिकांत गोस्वामी, मनोज कुमार सोनवानी, नरोत्तम शर्मा, डेविड दत्त, नाहिदा कुरैशी, नेमीचंद, राजेश गनौदवाले सहित अनेक प्रबुद्धजन शामिल थे।